न तो हिंदुका न तो मुसलमानका था


आज कल जिस तरह से धर्म – मजहब के नाम से सारे जहां में नफरत का आलम बना हुआ है, खास कर हमारे वतन में मजहब ओ धरम के नाम पर जो हिंसा हो रही है वो बहुत ही दर्दनाक है! परसों के दिन दिल्हीमें हुई हिंसा में २४ ईन्सानों की मोत हुई और २०० लोग गंभीर तरह से घायल हुए! कई गरीबों के रोजगार के साधन जला दिये गये! बेगुनाह लोगों की दुकानें, घरें, गाडीयां पर तो कहीं कहीं तो जिंदा लोगों पर जिंदा पेट्रोल बंब डाले गयें! ईससे ज्यादा शर्म की बात सारी ईन्सानियतके लिये हो नहीं सकती! जो लोगों ने, चाहे वे कोई भी देश के हों, कोई भी मजहब – धरम के हों, ईस आग को फैलाने में हिस्सा लिया वे सब को शर्मसार हो कर डूब मरना चाहिये! एक आह निकलती है दिल से और ये चंद शेर उस आह का ही रूप है जो आप सब के नजर करती हुं!

ना तो हिंदुका था ना तो वो मुसलमानका था!
जमींपे जो लहु बहा वो तो सिर्फ ईन्सानका था!

लबोंपे उनके आखरी नाम जाने क्या रहा होगा?
क्या फिर खुदाका होगा या फिर भगवानका था!

पूछे भी तो किससे क्युं मारा और किसने मारा!
बतायेंगे वो भी क्या यहां तो सवाल ईमानका था!

हम तो बंटे ही और बांटा खुदाकी खुदाईको भी!
उसमें न कोई हिंदुस्तान न तो पाकिस्तानका था!

नफरते-अहेसासमें ही जो जी रहें है हो बेखोफ!
न वो ईस जमींका था, न ईस आसमानका था!

– जयश्री विनु मरचंट, २/२७/२०